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अशोक हँस का साहित्यिक एवं रंगकर्मीय योगदान हिमाचल की सांस्कृतिक धरोहर: वक्ता

शिमला। ऐतिहासिक गेयटी थिएटर, शिमला के गरिमामयी सभागार में वरिष्ठ रंगकर्मी, साहित्यकार, लेखक एवं निर्देशक अशोक हँस द्वारा लिखित संस्मरणात्मक पुस्तक “प्रभु कभी नहीं मरते” का भव्य विमोचन संपन्न हुआ। यह विमोचन भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल प्रदेश के पूर्व निदेशक डॉ. प्रेम शर्मा के करकमलों द्वारा किया गया। यह विशेष कार्यक्रम साहित्य, रंगमंच और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों की गरिमामयी उपस्थिति से विशेष रूप से आलोकित रहा।
जीवन के अनुभवों का सशक्त दस्तावेज है यह पुस्तक: राकेश कंवर
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार के सचिव (शिक्षा एवं भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग) राकेश कंवर ने कहा कि अशोक हँस की यह पुस्तक केवल संस्मरणों का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन में घटित घटनाओं, अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं का एक सशक्त दस्तावेज है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि लेखक ने अपने जीवन के विविध प्रसंगों को पूरी सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और मुखरता के साथ प्रस्तुत किया है, जो पाठकों के लिए बेहद प्रेरणादायक सिद्ध होगी। उन्होंने आगे कहा कि लेखक, निर्देशक, अभिनेता और रूपांतरकार के रूप में अशोक हँस ने अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है तथा उनका यह बहुआयामी योगदान हिमाचल की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करता है। उन्होंने पुस्तक के सफल प्रकाशन पर लेखक को हार्दिक शुभकामनाएँ भी दीं।
दृढ़ संकल्प, सरलता और सहजता का संगम हैं अशोक हँस: डॉ. प्रेम शर्मा
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. प्रेम शर्मा ने अपने उद्बोधन में अशोक हँस को दृढ़ संकल्प, सरलता और सहजता का अद्भुत संगम बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य और रंगमंच के प्रति अशोक हँस की निष्ठा तथा समर्पण अनुकरणीय है। डॉ. शर्मा ने यह भी स्मरण कराया कि उनके पूर्व प्रकाशित काव्य-संग्रहों ने भी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है और उन्हें व्यापक सराहना प्राप्त हुई है।
लोक संस्कृति और सिद्धांतों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता
समारोह में राज्य के कई प्रख्यात विद्वानों और कलाकारों ने लेखक के योगदान को रेखांकित किया:
सुदर्शन वशिष्ठ (प्रख्यात साहित्यकार): उन्होंने कहा कि हिमाचल की लोकनाट्य परंपराओं—विशेषकर करियाला और बांठड़ा—के संरक्षण, अध्ययन और संवर्धन के क्षेत्र में अशोक हँस का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोक संस्कृति के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
प्रवीण चांदला (वरिष्ठ रंगकर्मी एवं निर्देशक): उन्होंने अशोक हँस के साथ किए गए अनेक नाट्य मंचनों को याद करते हुए उन्हें अपने कार्य के प्रति अत्यंत गंभीर, अनुशासित और समर्पित कलाकार बताया और कहा कि उनके साथ कार्य करना स्वयं में एक सीखने का अनुभव रहा है।
अछर सिंह परमार (वरिष्ठ उद्घोषक, आकाशवाणी शिमला एवं लोक कलाकार): उन्होंने कहा कि अशोक हँस कभी भी मध्य मार्ग या समझौतावादी प्रवृत्ति के पक्षधर नहीं रहे। उन्होंने सदैव अपने सिद्धांतों और मूल्यों के साथ कार्य किया है, और यही उनकी सफलता का सबसे बड़ा आधार है।
भूपेंद्र शर्मा (वरिष्ठ रंगकर्मी): उन्होंने अशोक हँस को ‘रंगमंच का अनुशासित सिपाही’ बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने निरंतर प्रयासों से शिमला रंगमंच को न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि प्रदेश से बाहर भी एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।
सांस्कृतिक विरासत को दिलाई व्यापक पहचान
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एवं साहित्यकार देवेंद्र कुमार गुप्ता ने अशोक हँस की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे सत्यता, तथ्यता और ईमानदार कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हिमाचल की लोक परंपराओं को भाषा एवं संस्कृति के मंच पर स्थापित करने तथा भाषा अकादमी के माध्यम से उसे व्यापक पहचान दिलाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
वहीं, पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी एवं साहित्यकार के. आर. भारती ने कहा कि हिमाचल की लोक संस्कृति, लोकनाट्य और लोकानुरंजन की परंपराओं पर अशोक हँस की गहरी पकड़ है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि “प्रभु कभी नहीं मरते” अपने रोचक संस्मरणों, जीवनानुभवों और विचारोत्तेजक प्रसंगों के कारण पाठकों को न केवल बाँधे रखेगी, बल्कि उन्हें नई दृष्टि और प्रेरणा भी प्रदान करेगी।
कला प्रेमियों का उमड़ा हुजूम:
इस गरिमामयी कार्यक्रम में शिमला नगर के अनेक प्रतिष्ठित रंगकर्मी, साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकार, शिक्षाविद् एवं कला प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह पुस्तक विमोचन समारोह साहित्य, रंगमंच और संस्कृति के अनूठे संगम का एक यादगार अवसर बन गया, जहाँ सभी वक्ताओं ने अशोक हँस के दीर्घकालीन सृजनात्मक योगदान का मुक्त कंठ से सम्मान किया।

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