डॉ. नरेश कुमार कौंडल द्वारा हिमाचल और पहाड़ी संस्कृति के लिए एक और मास्टरस्ट्रोक
स्टाफ रिपोर्टर | शिमला | जून 2026
शिमला: भारत के पर्वतीय राज्यों के लिए हिमाचली और पहाड़ी शॉर्ट फिल्मों के लिए एक विशेष रेड कार्पेट तैयार होने जा रहा है। हिम टीवी मीडिया ने बुधवार को ‘पहाड़ी फिल्म्स फेस्टिवल 2027’ (PFF 2027) को लॉन्च करने की घोषणा की है, जो विशेष रूप से पहाड़ी कहानीकारों और फिल्म निर्माताओं के लिए बनाया गया एक अनूठा मंच है।
इस ऐतिहासिक पहल की कमान डॉ. नरेश कुमार कौंडल और एमडी सीमा कौंडल के हाथों में है। इसका मुख्य उद्देश्य उस दशकों पुराने सिलसिले को तोड़ना है, जहां क्षेत्रीय कंटेंट को राष्ट्रीय उत्सवों में हमेशा “साइड कैटेगरी” (दोयम दर्जे) में रख दिया जाता था। लॉन्च इवेंट के दौरान डॉ. कौंडल ने भावुक होते हुए कहा, “लंबे समय से मुंबई हमारी भाषाओं को केवल बोली और हमारी कहानियों को हाशिए पर रखता आया है। लेकिन PFF अब मुख्य मंच होगा। यहाँ कोई टोकन स्लॉट या औपचारिकता नहीं होगी।”
मुख्य तारीखों की घोषणा
आधिकारिक लॉन्च: जून 2026
एंट्री (पंजीकरण) की शुरुआत: 1 जुलाई 2027
सबमिशन की अंतिम तिथि: 10 फरवरी 2027
ग्रैंड फिनाले (महामुकाबला): 4 मार्च 2027
पहाड़ों के लिए अलग फिल्म फेस्टिवल क्यों?
आयोजकों ने उन तीन मुख्य कमियों को रेखांकित किया, जिन्हें PFF 2027 दूर करने की कोशिश करेगा:
1. भाषा को प्राथमिकता
मुख्यधारा के फिल्म फेस्टिवल्स में आमतौर पर हिंदी या अंग्रेजी सबटाइटल्स और बड़े बजट की मांग की जाती है, जिसके कारण कांगड़ी, किन्नौरी या भरमौरी में बनी फिल्में पीछे छूट जाती थीं। PFF इस ढर्रे को बदलेगा। इस फेस्टिवल में शामिल होने वाली फिल्मों के संवादों में 60-70% पहाड़ी बोली का होना अनिवार्य है। डॉ. कौंडल ने कहा, “अब पहली बार, फिल्म इंडस्ट्री हमारी भाषा को सीखेगी।”
2. वायरल से क्रेडिबल (विश्वसनीयता) तक का सफर
यूट्यूब पर लाखों व्यूज बटोरने के बावजूद, हिमाचली क्रिएटर्स को वह औपचारिक पहचान और सम्मान नहीं मिल पाता था जिसके वे हकदार हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए पारंपरिक हिमाचली रूपांकनों (मोटीफ्स) से सजा ‘हिम सिने अवार्ड’ शुरू किया जा रहा है। सीमा कौंडल ने कहा, “यह ट्रॉफी ऐसी होनी चाहिए जिसे देखकर लगे कि यह सच में पहाड़ों की अपनी है।”
3. संस्कृति का दस्तावेजीकरण (आर्काइविंग)
गद्दी प्रवासियों के जीवन से लेकर जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे सेब उत्पादकों तक, पहाड़ों की कई कहानियां आज भी अनकही हैं। PFF ने हर फिल्म के लिए हिमाचल से जुड़ी सामाजिक थीम को अनिवार्य किया है, ताकि सिनेमा के माध्यम से संस्कृति को हमेशा के लिए सहेज कर रखा जा सके।
क्या बातें PFF को बनाती हैं सबसे अलग?
बजट की कोई बाध्यता नहीं: पांगी के सुदूर इलाकों में मोबाइल फोन से शूट की गई फिल्में भी FTII (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) के स्नातकों के प्रोजेक्ट्स के साथ बराबरी से मुकाबला करेंगी। हिम टीवी मीडिया ने साफ किया कि यह फेस्टिवल “नो प्रॉफिट, नो लॉस” मॉडल पर चलेगा ताकि पैसे से ऊपर योग्यता को रखा जा सके।
गांव से सीधे OTT तक: 4 मार्च 2027 को होने वाले फिनाले के विजेताओं को केवल ट्रॉफी ही नहीं मिलेगी, बल्कि उन्हें हिम टीवी मीडिया पर प्राइम-टाइम टेलीकास्ट, OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए पिच सपोर्ट और हिमाचल प्रदेश फिल्म नीति के तहत लाभ भी दिए जाएंगे।
सिर्फ अवॉर्ड नहीं, नए फिल्म मेकर्स तैयार करना: 2027 की शुरुआत से ही हिमाचल के कॉलेजों में स्क्रिप्ट राइटिंग, डायरेक्शन और मोबाइल फिल्म मेकिंग पर मुफ्त वर्कशॉप आयोजित की जाएंगी, ताकि 1 जुलाई 2027 से सबमिशन विंडो खुलने से पहले छात्र पूरी तरह तैयार हो सकें।
पहाड़ी संस्कृति को समझने वाली जूरी: इस फेस्टिवल की जूरी में महानगरों के आलोचक नहीं, बल्कि हिमाचली लोक कलाकार, नाटी विशेषज्ञ और पहाड़ों के अनुभवी निर्देशक शामिल होंगे जो ‘झमाकड़ा’ जैसी लोक विधाओं को गहराई से समझते हैं।
आखिरी गांव तक पहुंचेगा सिनेमा: लाहौल-स्पीति और पांगी जैसे जिले जहां एक भी थिएटर नहीं है, वहां PFF विशेष सामुदायिक स्क्रीनिंग आयोजित करेगा ताकि ये कहानियां उन्हीं लोगों तक वापस पहुंचें जिनकी ये हैं।
भविष्य का बड़ा लक्ष्य
डॉ. नरेश कुमार कौंडल ने PFF को एक बड़े विजन के पहले कदम के रूप में पेश किया: फेस्टिवल \rightarrow अवॉर्ड्स \rightarrow राज्य स्तर पर पहचान \rightarrow फंडिंग \rightarrow हिमाचल में स्टूडियो \rightarrow पहाड़ी युवाओं के लिए रोजगार। उन्होंने सवाल उठाया, “अगर पंजाब के पास पॉलीवुड और बंगाल के पास टॉलीवुड हो सकता है, तो हिमाचली कहानियों को स्क्रीन पर दो मिनट के समय के लिए क्यों तरसना पड़े?”
हालांकि पहला संस्करण पूरी तरह हिमाचल पर केंद्रित है, लेकिन आयोजकों ने पुष्टि की है कि आने वाले वर्षों में इसमें जम्मू और उत्तराखंड की प्रविष्टियों को भी शामिल किया जाएगा, जिससे एक व्यापक ‘पैन-पहाड़ी सिनेमा इकोसिस्टम’ का निर्माण होगा।
“PFF सिर्फ एक इवेंट नहीं है, यह एक पूरी फिल्म इंडस्ट्री की शुरुआत का बीज है।” — डॉ. नरेश कुमार कौंडल
जैसा कि सीमा कौंडल ने बेहद खूबसूरती से कहा: “अगर हम अपनी कहानियां खुद नहीं सुनाएंगे, तो कौन सुनाएगा?”
फिलहाल, पहाड़ों को अपना जवाब मिल चुका है: “कहानी हमारी है, भाषा हमारी है, और अब पर्दा भी हमारा होगा।”